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सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म ...

सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म ...
मनोज कुमारः समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता
मनोज कुमारः समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा. शायद यही कारण है कि जब समाज के चार स्तंभों का जिक्र होता है तो मीडिया को एक स्तंभ माना गया है. समाज को इस बात का इल्म था कि यह एक ऐसा माध्यम है जो कभी ...

पाठकों की भाषा बिगाड़ रहे अखबार ...

पाठकों की भाषा बिगाड़ रहे अखबार   ...
वो दिन लद गए जब प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी अपना सामान्य ज्ञान ही नही व्याकरण भी सुधारते थे। यूं कहिए अखबारों
वो दिन लद गए जब प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी अपना सामान्य ज्ञान ही नही व्याकरण भी सुधारते थे। यूं कहिए अखबारों पर उनकी निर्भरता कुछ ज्यादा हुआ करती थी । आज अगर अखबार के भरोसे रहे प्रतियोगी परीक्षा क्या घरेलू परीक्षा में भी " लुटिया " डूबनी तय है। पहले एक शहर से एक दो ही अखबार निकला करते थे आज अखबारों की "सुनामी" आ गई है। किसी भी दिन का अखबार ...

क्या हर बात के मीडिया ही जिम्मेदार ...

क्या हर बात के मीडिया ही जिम्मेदार ...
वर्तमान में मीडिया की पहुंच आम से खास तक है। सोशल मीडिया के दौर में एक ही क्षण में बधाईओं और आलोचनाओं की झड़ी लग जाती है। लेकिन सच्चाई कुछ और है जिधर हम सोच
क्या हर बात के मीडिया ही जिम्मेदार वर्तमान में मीडिया की पहुंच आम से खास तक है। सोशल मीडिया के दौर में एक ही क्षण में बधाईओं और आलोचनाओं की झड़ी लग जाती है। लेकिन सच्चाई कुछ और है जिधर हम सोच नहीं पाते। दरअसल देश में अव्यवस्था का मूलकारण अधिकारी-कर्मचारियों की तानाशाही और भ्रष्टाचार है। और यह इसलिए है क्योंकि उनकी नौकरी १०० प्रतिशत सुरक्षित ...

जो लोग प्रभाष जी का पैर छूते नहीं अघाते थे वे पद से हटते ही कतराने लगे ...

जो लोग प्रभाष जी का पैर छूते नहीं अघाते थे वे पद से हटते ही कतराने लगे ...
Sanjay Sinha. मैं जिन दिनों जनसत्ता में काम करता था, मैंने वहां काम करने वाले बड़े-बड़े लोगों को प्रधान संपादक प्रभाष जोशी
Sanjay Sinha. मैं जिन दिनों जनसत्ता में काम करता था, मैंने वहां काम करने वाले बड़े-बड़े लोगों को प्रधान संपादक प्रभाष जोशी के पांव छूते देखा था। शुरू में मैं बहुत हैरान होता था कि दफ़्तर में पांव छूने का ये कैसा रिवाज़ है। लेकिन जल्दी ही मैं समझने लगा कि लोगों की निगाह में प्रभाष जोशी का कद इतना बड़ा है कि लोग उनके पांव छू कर उनसे आशीर्वाद लेना चाह ...

एक कलमकार की व्यथा ...

 एक कलमकार की व्यथा ...
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ सुपरिचित कलमकार शर्मा जी कहते हैं कि पत्नी पुत्र से अपेक्षा करती है कि उसका बेटा श्रवण कुमार बने
शर्मा जी के श्रवण कुमार: यह कैसी पितृभक्ति...? -डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ सुपरिचित कलमकार शर्मा जी कहते हैं कि पत्नी पुत्र से अपेक्षा करती है कि उसका बेटा श्रवण कुमार बने परन्तु दूसरी तरफ पति को श्रवण कुमार बनते हुए देख नहीं सकती। यदि मैं श्रवण कुमार नहीं बन सका- तब पुत्र से कैसी अपेक्षा? लोगों, हित-मित्रों से दुःख बांटना और यह कहना कि मैं बड़ ...

करियर के पहले संपादक ने सिखाया , “पत्रकारिता जीने का तरीका है” ...

करियर के पहले संपादक ने सिखाया , “पत्रकारिता जीने का तरीका है” ...
पुण्य प्रसून वाजपेयी। मौजूदा दौर में पत्रकारिता करते हुये पच्चीस-छब्बीस बरस पहले की पत्रकारिता में झांकना और अपने ही शुरुआती करियर के दौर को समझना शायद एक बेहद कठिन कार्य से
पुण्य प्रसून वाजपेयी। मौजूदा दौर में पत्रकारिता करते हुये पच्चीस-छब्बीस बरस पहले की पत्रकारिता में झांकना और अपने ही शुरुआती करियर के दौर को समझना शायद एक बेहद कठिन कार्य से ज्यादा त्रासदियों से गुजरना भी है। क्योंकि 1988-89 के दौर में राजनीति पहली बार सामाजिक-आर्थिक दायरे को अपने अनुकूल करने के उस हालात से गुजर रही थी और पत्रकारिता ठिठक कर उन हाला ...

सुधीर चौधरी, यही असहिष्णुता है ...

सुधीर चौधरी, यही असहिष्णुता है ...
Sanjaya Kumar Singh के फेसबुक वाल से। देश में असहिष्णुता का वातावरण है – ऐसा कहा नहीं कि देश के नागरिकों का एक बड़ा वर्ग राशन-पानी लेकर आपके पीछे पड़ जाएगा। केंद्र में भारतीय
Sanjaya Kumar Singh के फेसबुक वाल से। देश में असहिष्णुता का वातावरण है – ऐसा कहा नहीं कि देश के नागरिकों का एक बड़ा वर्ग राशन-पानी लेकर आपके पीछे पड़ जाएगा। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद माहौल बदल गया है - ऐसा मानने वाले साहित्यकारों में संभवतः उदय प्रकाश ने सबसे पहले अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी। जब लौटाय ...

जो मीडिया हम बना रहे हैं ...

जो मीडिया हम बना रहे हैं ...
-संजय द्विवेदी। उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस आँधी में जैसा मीडिया हमने बनाया है, उसमें ‘भारतीयता’ और ‘भारत’ की उपस्थिति कम होती जा रही है। इस चकाचौंध भरी दुनिया
-संजय द्विवेदी। उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस आँधी में जैसा मीडिया हमने बनाया है, उसमें ‘भारतीयता’ और ‘भारत’ की उपस्थिति कम होती जा रही है। इस चकाचौंध भरी दुनिया में मीडिया का पारंपरिक चेहरा-मोहरा कहीं छिप सा गया है। वह सर्वव्यापी और सर्वग्रासी विस्तार लेता हुआ, अपने प्रभाव से आतंकित तो कर रहा है किंतु प्रभावित नहीं। आस्था तो छोड़िए उसके प्रति भरोस ...

मुझे भी सम्मान की दरकार, क्या सम्भव है? ...

मुझे भी सम्मान की दरकार, क्या सम्भव है? ...
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ पाठकों मैं वादा करता हूँ कि यदि मुझे कोई सम्मान मिला तो मैं उसे कभी भी किसी भी परिस्थिति में लौटाने की नहीं सोचूँगा। एक बात और बता दूँ वह यह कि मेरी कोई
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी। पाठकों मैं वादा करता हूँ कि यदि मुझे कोई सम्मान मिला तो मैं उसे कभी भी किसी भी परिस्थिति में लौटाने की नहीं सोचूँगा। एक बात और बता दूँ वह यह कि मेरी कोई पहुँच नहीं और न ही मैंने राजनीति के शिखर पर बैठे लोगों, माननीयों का नवनीत लेपन ही किया है। मुझे चाटुकारिता से नफरत रही है, शायद इन्हीं सब कारणों से सम्मान पाना तो ...

प्लीज, उन्हें अपमानित मत कीजिए... ...

प्लीज, उन्हें अपमानित मत कीजिए... ...
आजकल साहित्य और साहित्यकारों में हलचल मची हुई है। लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए किए गए अब तक के सभी प्रयासों में साहित्य और साहित्यकारों की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता है।
आजकल साहित्य और साहित्यकारों में हलचल मची हुई है। लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए किए गए अब तक के सभी प्रयासों में साहित्य और साहित्यकारों की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता है। इसके साथ ही साहित्यकारों का आचार-व्यवहार लंबे समय से सरकार और आलोचकों के निशाने पर रहा है। पिछले दिनों लगातार घट रहीं असंवेदनशील घटनाओं के चलते साहित्यकारों का एक बड़ा वर ...

कैसे कहूं-फिर वही दिल लाया हूं.. ? ...

कैसे कहूं-फिर वही दिल लाया हूं.. ? ...
जानता हूं कि यह इतना आसान नहीं है लेकिन पत्रकारिता में थोड़े दिनों की बेरोजगारी भी बहुत जरूरी है। वैसे तो रहीम चाचा कह ही गए हैं, हित अनहित या जगत में जानि परत सब कोय..,
जानता हूं कि यह इतना आसान नहीं है लेकिन पत्रकारिता में थोड़े दिनों की बेरोजगारी भी बहुत जरूरी है। वैसे तो रहीम चाचा कह ही गए हैं, हित अनहित या जगत में जानि परत सब कोय.., लेकिन पत्रकारिता में यह परख कुछ ज्यादा ही जरूरी है। वास्तव में सक्रिय पत्रकारिता में आप एक चमक-दमक भरी दुनिया के अभ्यस्त हो जाते हैं। सुबह फोन से नींद खुलना, खबर छप जाने की कुछ तारी ...

इन्द्राणी, मर्डर और मीडिया ट्रायल ...

इन्द्राणी, मर्डर और मीडिया ट्रायल ...
n.k.singh। यह आरोप अक्सर लगता है कि किसी अपराध को सनसनीखेज बना कर मीडिया खुद हीं जांचकर्ता, वकील और जज बन जाता है जब कि पुलिस अभी दूर-दूर तक मामले
n.k.singh। यह आरोप अक्सर लगता है कि किसी अपराध को सनसनीखेज बना कर मीडिया खुद हीं जांचकर्ता, वकील और जज बन जाता है जब कि पुलिस अभी दूर-दूर तक मामले की सच्चाई के आस –पास भी नहीं पहुँचती. इस मीडिया ट्रायल का नतीजा यह होता है कि पुलिस याने जांचकर्ता हीं नहीं जज भी दबाव में आ जाते हैं और हकीकत और फैसला सब कुछ उलटा-पुल्टा हो जाता है. सवाल यह है कि अगर मी ...

रिपोर्ट पढऩे को हमारा मुख्य स्रोत जीवित ही नहीं रहा ...

रिपोर्ट पढऩे को हमारा मुख्य स्रोत जीवित ही नहीं रहा ...
शंभूनाथ शुक्ल । उतरते बैशाख की उस रात गर्मी खूब थी मगर हिंचलाल हमें अपने घर के अंदर ही बिठाए बातचीत कर रहा था ऊपर से चूल्हे का धुआँ और तपन परेशान कर रही थी।
शंभूनाथ शुक्ल । उतरते बैशाख की उस रात गर्मी खूब थी मगर हिंचलाल हमें अपने घर के अंदर ही बिठाए बातचीत कर रहा था ऊपर से चूल्हे का धुआँ और तपन परेशान कर रही थी। मैने कहा कि कामरेड हम बाहर बैठकर बातें करें तो बेहतर रहे। हिंचलाल बोला कि हम बाहर बैठ तो सकते हैं पर आप शायद नहीं समझ रहे हैं कि भीतर की गर्मी बाहर की हवा से सुरक्षित है। बाहर कब कोई छिपकर हम ...

हिन्दी के आयोजनों को चश्मा उतार कर देखें ...

हिन्दी के आयोजनों को चश्मा उतार कर देखें ...
मध्यप्रदेश भारत का ह्दयप्रदेश है और हिन्दी के एक बड़ी पट्टी वाले प्रदेश के रूप में हमारी पहचान है। हिन्दी हमारे प्रदेश की पहचान है और लगातार निर्विकार भाव से
-मनोज कुमार! मध्यप्रदेश भारत का ह्दयप्रदेश है और हिन्दी के एक बड़ी पट्टी वाले प्रदेश के रूप में हमारी पहचान है। हिन्दी हमारे प्रदेश की पहचान है और लगातार निर्विकार भाव से हिन्दी में कार्य व्यवहार की गूंज का ही परिणाम है कि चालीस साल बाद हिन्दी के विश्वस्तरीय आयोजन को लेकर जब भारत का चयन किया गया तो इस आयोजन के लिए मध्यप्रदेश को दसवें विश्व हिन्दी ...

हिंदी की जरूरत किसे है? ...

हिंदी की जरूरत किसे है? ...
संजय द्विवेदी। अब जबकि भोपाल में 10 सितंबर से विश्व हिंदी सम्मेलन प्रारंभ हो रहा है, तो यह जरूरी है कि हम हिंदी की विकास बाधाओं पर बात जरूर करें। यह भी पहचानें कि हिंदी किसकी है
संजय द्विवेदी। अब जबकि भोपाल में 10 सितंबर से विश्व हिंदी सम्मेलन प्रारंभ हो रहा है, तो यह जरूरी है कि हम हिंदी की विकास बाधाओं पर बात जरूर करें। यह भी पहचानें कि हिंदी किसकी है और हिंदी की जरूरत किसे है? ह चौहान जब भोपाल की सड़कों पर व्यापारियों से यह आग्रह करने निकले कि “आप अंग्रेजी के साथ बोर्ड पर हिंदी में भी नाम लिखें,” तो यह पहल भी साधारण ...

हिंदी की फुल स्पीड...!! ...

हिंदी की फुल स्पीड...!! ...
तारकेश कुमार ओझा। जब मैने होश संभाला तो देश में हिंदी – विरोध और समर्थन दोनों का मिला – जुला माहौल था। बड़ी संख्या में लोग हिंदी प्रेमी थे, जो लोगों से
तारकेश कुमार ओझा। जब मैने होश संभाला तो देश में हिंदी – विरोध और समर्थन दोनों का मिला – जुला माहौल था। बड़ी संख्या में लोग हिंदी प्रेमी थे, जो लोगों से हिंदी अपनाने की अपील किया करते थे। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों खास कर तामिलनाडु में इसके हिंसक विरोध की खबरें भी जब – तब सुनने – पढ़ने को मिला करती थी। हालांकि काफी प्रयास के बावजूद इसकी वजह मेरी सम ...

कब तक लटकती रहेगी तलवार ...

कब तक लटकती रहेगी तलवार ...
हिन्दी पत्रकारिता संक्रमण काल से गुजर रही है... यह बात तबसे (1987) सुन रहा हूँ जब पत्रकारिता शुरू की थी | बातचीत के दौरान मेरे सीनियर यह जुमला दोहराते थे... अब सोचता हूँ की कब
हिन्दी पत्रकारिता संक्रमण काल से गुजर रही है... यह बात तबसे (1987) सुन रहा हूँ जब पत्रकारिता शुरू की थी | बातचीत के दौरान मेरे सीनियर यह जुमला दोहराते थे... अब सोचता हूँ की कब इसके अच्छे दिन थे ? वो दिन लद गए जब पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी...आजादी के पहले अंग्रेजों से लड़ने का हथियार हुआ करती थी अब धंधा होकर रह गयी है | हर धंधे की तरह इसका भी उद्द ...

रवीश कुमार ने कुछ गलत कहा क्या ...

रवीश कुमार ने कुछ गलत कहा क्या ...
Sanjaya Kumar Singh के फेसबुक वाल से। “इस देश में एक पार्टी की तारीफ करते हुए आप लिखते रहें कोई दलाल नहीं कहेगा। इस पार्टी के समर्थकों ने अपनी पार्टी की आलोचना करने वालों को दलाल
Sanjaya Kumar Singh के फेसबुक वाल से। “इस देश में एक पार्टी की तारीफ करते हुए आप लिखते रहें कोई दलाल नहीं कहेगा। इस पार्टी के समर्थकों ने अपनी पार्टी की आलोचना करने वालों को दलाल बताने का ठेका ले रखा है। कई पत्रकार, स्तंभकार बेशर्मी से इस पार्टी की चाटुकारिता कर रहे हैं। कभी मैंने उनकी मरम्मत होते नहीं देखा। कोई उन्हें लेकर पत्रकारिता का संकट नहीं ...

रवीश कुमार सही में दलाल है ...

रवीश कुमार सही में दलाल है ...
रवीश कुमार। सभी मुद्दे वे मुद्दे हैं जिन पर रवीश कुमार को बोलना चाहिए या प्राइम टाइम में चर्चा करनी चाहिए । सभी बोल भी लें लेकिन सभी मुद्दों पर सभी का बोलना तभी माना जाएगा जब
रवीश कुमार। सभी मुद्दे वे मुद्दे हैं जिन पर रवीश कुमार को बोलना चाहिए या प्राइम टाइम में चर्चा करनी चाहिए । सभी बोल भी लें लेकिन सभी मुद्दों पर सभी का बोलना तभी माना जाएगा जब रवीश कुमार बोलेंगे या प्राइम टाइम में चर्चा करेंगे । जैसे जब प्राइम टाइम और फेसबुक नहीं था उस टाइम के भी सभी मुद्दों का हिसाब कुछ लोग रवीश कुमार से लेते हैं । तब तो आप नहीं ...

मीडिया, पुलिस और जनमत ...

मीडिया, पुलिस और जनमत ...
नीलांजन मुखोपाध्याय। हम भारतीय संपन्न लोगों से संबंधित हत्या के मामले की रिपोर्टिंग करने और उसे पढ़ने में काफी दिलचस्पी लेते हैं। ऐसे मामलों में मीडिया हमेशा जांच पूरी होने से पहले
नीलांजन मुखोपाध्याय। हम भारतीय संपन्न लोगों से संबंधित हत्या के मामले की रिपोर्टिंग करने और उसे पढ़ने में काफी दिलचस्पी लेते हैं। ऐसे मामलों में मीडिया हमेशा जांच पूरी होने से पहले ही अपना फैसला सुना देता है। पहली बार वर्ष 1959 में मीडिया ने नानावटी हत्या मामले में निर्णायक काम किया था, जब ज्यूरी ने मीडिया से बेहद प्रभावित होते हुए जोशीले नौसेना अध ...

आपातकाल और मीडिया ...

आपातकाल और मीडिया ...
Mukesh Kumar। हर साल की तरह इमर्जेंसी को याद करने की रस्म अदायगी इस साल भी संपन्न की गई। इस बार भी ये कर्मकांड करते हुए वही चूक हुई जो हर बार होती है। आपातकाल को याद
Mukesh Kumar। हर साल की तरह इमर्जेंसी को याद करने की रस्म अदायगी इस साल भी संपन्न की गई। इस बार भी ये कर्मकांड करते हुए वही चूक हुई जो हर बार होती है। आपातकाल को याद करते समय़ केवल मीडिया पर लगे प्रतिबंधों को याद किया गया। इमर्जेंसी के दौरान हुई दूसरी ज़्यादतियों का उल्लेख नहीं हुआ और अगर हुआ भी तो बहुत कम। ऐसा शायद इसलिए होता है कि मीडिया को अपने ...

सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया सत्ता-मीडिया गठजोड़ ...

 सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया सत्ता-मीडिया गठजोड़ ...
Punya Prasun Bajpai के ब्लाग से। आजादी के अडसठ बरस बाद यह सोचना कि मीडिया कितना स्वतंत्र है। यह अपने आप में कम त्रासद नहीं है। खासकर तब जबकि सत्ता और मीडिया
Punya Prasun Bajpai के ब्लाग से। आजादी के अडसठ बरस बाद यह सोचना कि मीडिया कितना स्वतंत्र है। यह अपने आप में कम त्रासद नहीं है। खासकर तब जबकि सत्ता और मीडिया की साठगांठ खुले तौर पर या तो खुशहाल जिन्दगी जीने और परोसने का नाटक कर रही हो या फिर कभी विकास के नाम पर तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर मीडिया को धंधे में बदलने की बिसात को ही चौथा स्तंम्भ करार देन ...

शर्मनाक हार और बेगैरत मीडिया ...

शर्मनाक हार और बेगैरत मीडिया ...
Sushil Upadhyay। भारत-श्रीलंका मैच के तीसरे दिन ही हिंदी चैनलों ने भारतीय टीम को जिता दिया था, जयकारे और वाह-वाह सुनाई देने लगी थी। मेरे जैसे तमाम दर्शक परेशान थे कि
Sushil Upadhyay। भारत-श्रीलंका मैच के तीसरे दिन ही हिंदी चैनलों ने भारतीय टीम को जिता दिया था, जयकारे और वाह-वाह सुनाई देने लगी थी। मेरे जैसे तमाम दर्शक परेशान थे कि खेल में कुछ भी हो सकता है, लेकिन चैनल तय मान बैठे हैं कि जीत भारत की ही होगी। तमाम नामी, धुरंधर और दिग्गज मीडियाकार ऐलान कर रहे थे कि भारत की आजादी के दिन क्रिकेट टीम तोहफा देगी। लेक ...

हर शाख पे उल्लू बैठा है ...

हर शाख पे उल्लू बैठा है ...
पत्रकारिता के अव्वल, दोयम और फर्जी संस्थानों से हर साल सपनीली आंखों वाले लड़के-लड़कियों के झुंड बाहर निकल रहे हैं. इनमें से बहुतेरे किसी दोस्त, परिचित के हवाले से मुझसे मिलते हैं.
पत्रकारिता के अव्वल, दोयम और फर्जी संस्थानों से हर साल सपनीली आंखों वाले लड़के-लड़कियों के झुंड बाहर निकल रहे हैं. इनमें से बहुतेरे किसी दोस्त, परिचित के हवाले से मुझसे मिलते हैं. कॅरिअर के बारे में सलाह मांगने के बीच में अचानक उतावले होकर बोल पड़ते हैं, सर! कोई नौकरी हो तो बताइए, मैं अपनी जान लगा दूंगा या दूंगी. तब किसी आदिम प्रवृत्ति के तहत मेर ...

@जिंदा रहने का सबूत देना पड़ता है ...

 @जिंदा रहने का सबूत देना पड़ता है ...
Santosh Kumar के फेसबुक वाल से। 8 अगस्त को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में दो दिवसीय नेशनल कंसल्टेसन ऑन मीडिया फ्रीडम एंड लॉ के पहले दिन के गहमागहमी के बाद यह बात सामने
Santosh Kumar के फेसबुक वाल से। 8 अगस्त को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में दो दिवसीय नेशनल कंसल्टेसन ऑन मीडिया फ्रीडम एंड लॉ के पहले दिन के गहमागहमी के बाद यह बात सामने निकल कर आई कि "इस लोकतंत्र" में जिंदा रहने का सबूत देना पड़ेगा, नहीं तो उसे मरा हुआ ही मान लिया जाएगा। विमर्श का मुद्दा था मीडिया और मीडियाकर्मीयों पर लगातार हो रहे हमले, उसकी कानूनी वै ...

आत्म नियमन फेल नियमन की जरूरत ...

 आत्म नियमन फेल नियमन की जरूरत ...
आज मीडिया अराजकता और दायित्वहीनता से गुजर रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह स्वार्थ सिद्धि है, उद्देश्य बदल चुके हैं, जनसरोकारों से रिश्ता टूट चुका है. इसलिए जरूरी है कि आत्मनियमन के भ्रमजाल से निकल कर नियमन की दिशा में कदम उठाए जाएं
आज मीडिया अराजकता और दायित्वहीनता से गुजर रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह स्वार्थ सिद्धि है, उद्देश्य बदल चुके हैं, जनसरोकारों से रिश्ता टूट चुका है. इसलिए जरूरी है कि आत्मनियमन के भ्रमजाल से निकल कर नियमन की दिशा में कदम उठाए जाएं मुकेश कुमार। अब ये लगभग सिद्ध हो गया है कि मीडिया उद्योग द्वारा आत्म नियमन के जरिए खुद को दुरूस्त करने के तमाम दावे ...

धर्म को धोखा देते ये कथित संत ...

धर्म को धोखा देते ये कथित संत  ...
आसाराम प्रकरण के बाद ऐसा लगने लगा था कि देश में बाबाओं के मायाजाल से आम आदमी दूर हो जाएगा किन्तु हाल ही में उजागर हुए दो मामलों से मैं गलत साबित
आसाराम प्रकरण के बाद ऐसा लगने लगा था कि देश में बाबाओं के मायाजाल से आम आदमी दूर हो जाएगा किन्तु हाल ही में उजागर हुए दो मामलों से मैं गलत साबित हुआ हूं। ओडिशा में खुद को भगवान विष्णु का अवतार बताने वाले सारथि बाबा हों या देवी दुर्गा का अवतार कहलाने वाली सुखविंदर कौर उर्फ़ बब्बू उर्फ़ राधे मां; धर्म का ऐसा मखौल इस देश में बन गया है मानो ईश्वर इ ...

स्वतंत्र भारत में खबरों की आजादी...!! ...

स्वतंत्र भारत में खबरों की आजादी...!! ...
आजादी के बाद से खबरचियों यानी मीडिया के क्षेत्र में भी आमूलचूल परिवर्तन आया है। पहले मीडिया से जुड़े लोग फिल्म निदेशकों की तरह हमेशा पर्दे के पीछे ही
तारकेश कुमार ओझा आजादी के बाद से खबरचियों यानी मीडिया के क्षेत्र में भी आमूलचूल परिवर्तन आया है। पहले मीडिया से जुड़े लोग फिल्म निदेशकों की तरह हमेशा पर्दे के पीछे ही बने रहते थे। लेकिन समय के साथ इतना बदलाव आया है कि अब इस क्षेत्र के दिग्गज बिल्कुल किसी सेलीब्रिटी की तरह परिदृश्य के साथ पर्दे पर भी छाये रहते हैं।अपने ही चैनल पर अपना इंटरव् ...

खो रही है चमकः कुछ करिए सरकार ...

खो रही है चमकः कुछ करिए सरकार ...
-संजय द्विवेदी। नरेंद्र मोदी के चाहने वाले भी अगर उनकी सरकार से निराशा जताने लगे हों तो यह उनके संभलने और विचार करने का समय है। कोई भी सरकार अपनी छवि और इकबाल
-संजय द्विवेदी। नरेंद्र मोदी के चाहने वाले भी अगर उनकी सरकार से निराशा जताने लगे हों तो यह उनके संभलने और विचार करने का समय है। कोई भी सरकार अपनी छवि और इकबाल से ही चलती है। चाहे जिस भी कारण से अगर आपके चाहने वालों में भी निराशा आ रही है तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी की सरकार पहले दिन से ही अपने विरोधियों के निशाने पर है। दिल ...

टिटिहरी पत्रकार, बरसाती चैनल ...

टिटिहरी पत्रकार, बरसाती चैनल ...
अभिषेक श्रीवास्तव। फरवरी-2015 की गुनगुनी धूप और निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाता नोएडा का सेक्टर-63… दिन के बारह बज रहे हैं और एक बेरोजगार पत्रकार तिपहिया
अभिषेक श्रीवास्तव। फरवरी-2015 की गुनगुनी धूप और निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाता नोएडा का सेक्टर-63… दिन के बारह बज रहे हैं और एक बेरोजगार पत्रकार तिपहिया ऑटो से एक पता खोज रहा है. उसने सुना है कि यहां कोई नया समाचार चैनल खुलने वाला है. किसी माध्यम से उसे यहां मालिक से मिलने के लिए भेजा गया है. कांच के इस जंगल में करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद ...

वर्तमान की भौतिकवादी मीडिया ...

वर्तमान की भौतिकवादी मीडिया ...
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी। मीडिया जगत से जुड़े लोग कुछ उस तरह के हो गए हैं जैसे पुराने समय में एक राज्य का महामंत्री। शायद इस कहानी को अधिकाँश लोग नहीं सुने होंगे। उस कहानी
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी। मीडिया जगत से जुड़े लोग कुछ उस तरह के हो गए हैं जैसे पुराने समय में एक राज्य का महामंत्री। शायद इस कहानी को अधिकाँश लोग नहीं सुने होंगे। उस कहानी का सार यहाँ प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया है। कहानी के अनुसार उक्त राज्य में अकाल पड़ गया था प्रजा में त्राहि-त्राहि मची थी। यह बात राजा के कानो तक नहीं पहुँची थी। राजा जब भीं ...

जन्मदिन 8 अगस्त पर विशेष लेखः राजेन्द्र माथुर की गैरहाजिरी के 25 साल ...

जन्मदिन 8 अगस्त पर विशेष लेखः राजेन्द्र माथुर की गैरहाजिरी के 25 साल ...
-मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार। किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेन्द्र माथुर के जा
-मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार। किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेन्द्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 8 अगस्त को राजेन्द्र माथुर का जन्मदिवस है किन्तु उनके नहीं रहने के पच्चीस बरस की रिक्तता आज भी हिन्दी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेन्द ...

मीडिया में नियमित और सुकून की नौकरी ...

मीडिया में नियमित और सुकून की नौकरी  ...
Sanjaya Kumar Singh! मीडिया में ऐसा नहीं है कि अगर आपने एक स्तरीय मीडिया संस्थान में नौकरी शुरू की, अच्छा काम करते हैं, योग्य हैं तो उसी में रहेंगे,
Sanjaya Kumar Singh! मीडिया में ऐसा नहीं है कि अगर आपने एक स्तरीय मीडिया संस्थान में नौकरी शुरू की, अच्छा काम करते हैं, योग्य हैं तो उसी में रहेंगे, समय के साथ आपको तरक्की मिलती रहेगी और आप संतुष्ट या असंतुष्ट रहकर भी उसी में नौकरी करते हुए रिटायर हो जाएं। अमूमन ऐसा देखने मे नहीं आता है – कुछेक अपवाद जरूर होंगे। 20-25 वर्षों से कॉरपोरेट संस्थानों ...

ये जो मीडिया, जनतंत्र के लिए खतरनाक है: ...

ये जो मीडिया, जनतंत्र के लिए खतरनाक है: ...
Vineet Kumar के फेसबुक वाल से। क्या नेटवर्क 18, दैनिक भास्कर समूह, जी नेटवर्क, टाइम्स ग्रुप या ऐसे तमाम मीडिया समूह जनतंत्र की मूल आत्मा और उसके ढांचे के लिए खतरनाक हैं
Vineet Kumar के फेसबुक वाल से। क्या नेटवर्क 18, दैनिक भास्कर समूह, जी नेटवर्क, टाइम्स ग्रुप या ऐसे तमाम मीडिया समूह जनतंत्र की मूल आत्मा और उसके ढांचे के लिए खतरनाक हैं जो एक ही साथ दर्जनभर से ज्यादा ब्रांड को चमकाने और उनसे अपने मीडिया बिजनेस का प्रसार करने में लगे हैं ? देश के इन प्रमुख मीडिया घरानों के संबंध में अगर ये बात सवाल की शक्ल में न करक ...

देश को क्यों बांट रहा है मीडिया, कलाम हों रोलमाडल या मेमन सोचना होगा ...

देश को क्यों बांट रहा है मीडिया,  कलाम हों रोलमाडल या मेमन सोचना होगा ...
-संजय द्विवेदी। काफी समय हुआ पटना में एक आयोजन में माओवाद पर बोलने का प्रसंग था। मैंने अपना वक्तव्य पूरा किया तो प्रश्नों का समय आया। राज्य के बहुत वरिष्ठ नेता, उस समय
-संजय द्विवेदी। काफी समय हुआ पटना में एक आयोजन में माओवाद पर बोलने का प्रसंग था। मैंने अपना वक्तव्य पूरा किया तो प्रश्नों का समय आया। राज्य के बहुत वरिष्ठ नेता, उस समय विधान परिषद के सभापति रहे स्व.श्री ताराकांत झा भी उस सभा में थे, उन्होंने मुझे जैसे बहुत कम आयु और अनुभव में छोटे व्यक्ति से पूछा “आखिर देश का कौन सा प्रश्न या मुद्दा है जिस पर सभ ...

याकूब मेमन के फांसी पर सियासत ...

याकूब मेमन के फांसी पर सियासत ...
याकूब मेमन को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी दी है और यहां तक की राष्ट्रपति द्वारा भी मेनन के याचिका को ठुकराया जा चुका था। ऐसे में अगर मेनन को फांसी की सजा होती है
याकूब मेमन को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी दी है और यहां तक की राष्ट्रपति द्वारा भी मेनन के याचिका को ठुकराया जा चुका था। ऐसे में अगर मेनन को फांसी की सजा होती है तो इसमें उस व्यक्ति को बोलने का कतई अधिकार नहीं जो कानून और साक्ष्य के प्रति अपरिचित हो। उच्च न्यायालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय के जज जिन्होंने फांसी की सजा सुनाई उनके समक्ष समस्त ...

एक आततायी भीड़ का शोकगान ...

एक आततायी भीड़ का शोकगान ...
Abhishek Srivastava के फेसबुक वाल से। टीवी चैनलों में लिंक न्‍यूज़ का प्रयोग Punya Prasun Bajpai ने किया था। उनकी आदत है कि हर ख़बर को दूसरी ख़बर के साथ जोड़कर बुलेटिन बनाते हैं
Abhishek Srivastava के फेसबुक वाल से। टीवी चैनलों में लिंक न्‍यूज़ का प्रयोग Punya Prasun Bajpai ने किया था। उनकी आदत है कि हर ख़बर को दूसरी ख़बर के साथ जोड़कर बुलेटिन बनाते हैं ताकि एक परिप्रेक्ष्‍य निर्मित हो सके। इसीलिए आज सुबह जब वे रामेश्‍वरम और मुंबई को अलग-अलग दिखा रहे थे, तब मैंने उन्‍हें एक एसएमएस किया कि क्‍यों न दो विंडो में रामेश्‍वरम ...

चैनलों पर बकबकियों की बहस...!! ...

चैनलों पर बकबकियों की बहस...!! ...
फिल्म गदर करीब डेढ़ दशक पहले आई थी। लेकिन यह शायद इस फिल्म की लोकप्रियता का ही परिणाम है कि अक्सर किसी न किसी चैनल यह प्रदर्शित होती
तारकेश कुमार ओझा फिल्म गदर करीब डेढ़ दशक पहले आई थी। लेकिन यह शायद इस फिल्म की लोकप्रियता का ही परिणाम है कि अक्सर किसी न किसी चैनल यह प्रदर्शित होती ही रहती है। यूं तो फिल्म में कई रोचक व दिल को छू जाने वाले प्रसंग है। लेकिन इस फिल्म का एक सीन वर्तमान राजनीति पर भी सटीक बैठता है। जिसमें पाकिस्तानी राजनेता बने अमरीश पुरी अपनी बेटी के साथ हुई ...

‘पेड न्यूज’ पर जवाबदेही तय हो ...

‘पेड न्यूज’ पर जवाबदेही तय हो ...
Sushil Upadhyay । सपाट शब्दों में कहें तो पेड न्यूज पाठकों के भरोसे के प्रति छल और कपटपूर्ण बर्ताव है। जिन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता के आकार-ग्रहण करने में मदद की और उसे वर्तमान
Sushil Upadhyay । सपाट शब्दों में कहें तो पेड न्यूज पाठकों के भरोसे के प्रति छल और कपटपूर्ण बर्ताव है। जिन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता के आकार-ग्रहण करने में मदद की और उसे वर्तमान स्तर तक पहुंचाया, पेड न्यूज उनके प्रति भी धोखा है। जैसा कि हम में से ज्यादातर लोग जानते हैं कि आजादी की लड़ाई के दौरान भाषायी पत्रकारिता ने काफी बड़ी चुनौतियों का सामना ...

भाषा की भी है एक राजनीति ...

भाषा की भी  है एक राजनीति ...
अब जबकि भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन सितंबर महीने में होने जा रहा तो एक बार यह विचार जरूर होना चाहिए कि आखिर हिंदी के विकास की समस्याएं क्या
संजय द्विवेदी! अब जबकि भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन सितंबर महीने में होने जा रहा तो एक बार यह विचार जरूर होना चाहिए कि आखिर हिंदी के विकास की समस्याएं क्या हैं? वे कौन से लोग और तत्व हैं जो हिंदी की विकास बाधा हैं? सही मायनों में हिंदी के मान-अपमान का संकट राजनीतिक ज्यादा है। हम पिछले सात दशकों में न तो हिंदी समाज बना सके न ही अपनी भाषा, माटी और ...

न्यूज, पेड न्यूज और फेड न्यूज! ...

न्यूज, पेड न्यूज और फेड न्यूज! ...
Sushil Upadhyay । भले ही साल दर साल वेब-न्यूज का प्रयोग बढ़ रहा हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अखबारों की प्रसार-संख्या में भी लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। कुछ साल पहले निजी
Sushil Upadhyay । भले ही साल दर साल वेब-न्यूज का प्रयोग बढ़ रहा हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अखबारों की प्रसार-संख्या में भी लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। कुछ साल पहले निजी चैनलों की आमद के बाद आशंका जताई गई थी कि आने वाले बरसों में अखबारों का अंत हो जाएगा। इसी प्रकार की आशंका उस वक्त जताई गई, जब इंटनरेट पर खबरों का दौर आरंभ हुआ। लेकिन, यथार्थ यह है ...

लोहिया के सपनों को तोड़ता मुलायम का नव-समाजवाद ...

लोहिया के सपनों को तोड़ता मुलायम का नव-समाजवाद ...
अजीब व्यवस्था है जिसमें कोई गायत्री प्रजापति या कोई राममूर्ति वर्मा अवैध खनन के आरोप के बावजूद हमारा रहनुमा बना रहता है पर इनके गैर-कानूनी हरकतों के खिलाफ आवाज
एनके सिंहः अजीब व्यवस्था है जिसमें कोई गायत्री प्रजापति या कोई राममूर्ति वर्मा अवैध खनन के आरोप के बावजूद हमारा रहनुमा बना रहता है पर इनके गैर-कानूनी हरकतों के खिलाफ आवाज उठाने वाला आई आई टी से पढ़ा भारतीय पुलिस सेवा का अधिकारी अमिताभ ठाकुर बलात्कार का आरोप झेलता इस बात पर निलंबित हो जाता है कि राज्य छोड़ने के लिए राज्य के पुलिस प्रमुख से इजाजत नह ...

सूरज तराश कौशल आ जाए अगर हमको--- ...

सूरज तराश कौशल आ जाए अगर हमको--- ...
Shrikant Singh के फेसबुक वाल से। हमारे एक वरिष्‍ठ सहयोगी कहा करते थे-बनारस में हम लोगों से कई गुना अधिक काबिल लोग बहुत कम सैलरी में खुश रहते हैं, क्‍योंकि उनका वहां
Shrikant Singh के फेसबुक वाल से। हमारे एक वरिष्‍ठ सहयोगी कहा करते थे-बनारस में हम लोगों से कई गुना अधिक काबिल लोग बहुत कम सैलरी में खुश रहते हैं, क्‍योंकि उनका वहां पत्रकारिता का शौक पूरा हो रहा है। उनकी दिनचर्या का एक अंग यह भी होता था कि खबर छापी और अगले दिन फोन पर लग गए अपने किसी साथी के साथ। देखा न क्‍या रिपोर्ट छापी है। हिला कर रख दिया है। इला ...

प्रभात खबर, धनबाद संस्करण का 16वें वर्ष में प्रवेश ...

प्रभात खबर, धनबाद संस्करण का 16वें वर्ष में प्रवेश  ...
साहिर लुधियानवी की यह पंक्ति क्यों? क्योंकि अलग झारखंड राज्य गठन के डेढ़ दशक और धनबाद नगर निगम को अस्तित्व में आये पांच वर्ष से अधिक समय गुजर चुके हैं. नये राज्य
‘नया सफर है, पुराने चिराग गुल कर दो.’’ साहिर लुधियानवी साहिर लुधियानवी की यह पंक्ति क्यों? क्योंकि अलग झारखंड राज्य गठन के डेढ़ दशक और धनबाद नगर निगम को अस्तित्व में आये पांच वर्ष से अधिक समय गुजर चुके हैं. नये राज्य से लेकर नगर निगम तक से जो उम्मीदें थीं, वह पूरी नहीं हो पायी. ऐसे में ‘निराश’ हो जाना मानवीय स्वभाव है. तो फिर साहिर लुधियानवी क ...

प्रामाणिकता की कसौटी पर खरी है यह बेबाक बयानी ...

प्रामाणिकता की कसौटी पर खरी है यह बेबाक बयानी ...
किसी भी लेखन, विशेषत: संस्मरणात्मक और विश्लेषणात्मक लेखन की श्रेष्ठता की पहली और अनिवार्य शर्त होती है, उसमें वर्णित तथ्यों की विश्वसनीयता। इस कसौटी पर डॉ. सुशील उपाध्याय की पुस्तक सौ फीसद कामयाब है। हालांकि वह मेरे बेहद विश्वसनीय और काबिल सहयोगी रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस पुस्तक के जरिये तथ्यात्मक ईमानदारी
Sushil Upadhyay के फेसबुक वाल से। मेरे संपादक रहे आदरणीय एल.एन.शीतल जी ने मेरी प्रकाशानाधीन किताब के लिए ये भूमिका लिखी है। अपने इस काम पर मैं इससे बेहतर और मार्गदर्शक-टिप्पणी की उम्मीद नहीं कर सकता था। शीतल जी ने जो आशीर्वाद दिया है, उनके लिए ‘धन्यवाद’ कह देना बहुत छोटा शब्द है। उनका मागर्दशन हमेशा मिलता रहे, यही कामना है। प्रामाणिकता की कसौटी ...

पत्रकारीय-आजादी का सवाल-1 ...

पत्रकारीय-आजादी का सवाल-1 ...
Sushil Upadhyay ! किसी भी पत्रकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी यह होती है कि लोग उस पर भरोसा करें। इसके साथ जुड़ी दूसरी बात यह है कि पत्रकार जिस संस्थान में
Sushil Upadhyay ! किसी भी पत्रकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी यह होती है कि लोग उस पर भरोसा करें। इसके साथ जुड़ी दूसरी बात यह है कि पत्रकार जिस संस्थान में कार्यरत है, वह संस्थान उस पर भरोसा करे। पत्रकारिता में भरोसे की जितनी अधिक महत्ता है, यह उतनी आसानी से हासिल नहीं होता है। पत्रकार हर वक्त सवालियाा निशान के दायरे में रहता है। पत्रकार को एक साथ क ...

ग्रीक ट्रेजडी के भारतीय मिथक ...

ग्रीक ट्रेजडी के भारतीय मिथक ...
ग्रीस की पवित्र वातोपेदी मॉनेस्ट्री के महंत इफ्राहीम व देश के शिपिंग मंत्री की पत्नी सहित 14 लोगों को पिछले साल नवंबर में जब ग्रीक सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी का दोषी करार दिया,
anshuman tiwari। ग्रीस की ट्रेजडी को घटिया गवर्नेंस व सियासत ने गढ़ा है. ग्रीस के ताजा संकट के कई मिथक भारत से मिलते हैं ग्रीस की पवित्र वातोपेदी मॉनेस्ट्री के महंत इफ्राहीम व देश के शिपिंग मंत्री की पत्नी सहित 14 लोगों को पिछले साल नवंबर में जब ग्रीक सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी का दोषी करार दिया, तब तक यह तय हो चुका था कि ग्रीस (यूनान) आइएमएफ के ...

तटस्थता, निरपेक्षता और पत्रकारिता के मूल्य-3 ...

तटस्थता, निरपेक्षता और पत्रकारिता के मूल्य-3 ...
Sushil Upadhyay । जैसा कि पहले गया है कि पत्रकारिता के मानक और मूल्य अक्सर गतिशील तत्व होते हैं। सत्य भी इस परिभाषा से बाहर नहीं है। सत्य को सही अर्थाें और सही संदर्भाें में
Sushil Upadhyay । जैसा कि पहले गया है कि पत्रकारिता के मानक और मूल्य अक्सर गतिशील तत्व होते हैं। सत्य भी इस परिभाषा से बाहर नहीं है। सत्य को सही अर्थाें और सही संदर्भाें में स्थापित किया जाना जरूरी है। ऐसा न होने पर कई बार असत्य ऐसा आभास देने लगता है कि वह सत्य है और उससे परे कुछ भी नहीं है। कोई भी पत्रकार सच को प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी किसी औ ...

पत्रकार जगेंद्र सिंह: पनवाड़ी से खबरची, फिर ‘फरार मुलजिम’ ...

पत्रकार जगेंद्र सिंह: पनवाड़ी से खबरची, फिर ‘फरार मुलजिम’ ...
अगस्त 2014 में मध्य उत्तर प्रदेश के शहर शाहजहांपुर में एक रहस्यमय पोस्टर पर सबकी निगाह पड़ी थी। गहरे बैंगनी पृष्ठभूमि के इस ‘वांछित’ पोस्टर में कथित के बारे में गंभीर
ईएनएस की रिपोर्ट। अगस्त 2014 में मध्य उत्तर प्रदेश के शहर शाहजहांपुर में एक रहस्यमय पोस्टर पर सबकी निगाह पड़ी थी। गहरे बैंगनी पृष्ठभूमि के इस ‘वांछित’ पोस्टर में कथित के बारे में गंभीर आरोप थे। पोस्टर में उसे उगाही, ब्लैकमेल करने वाला अपराधी तत्व बताया गया था। इसमें कहा गया था कि उसके खिलाफ कई मामले दर्ज हैं। पोस्टर में कहा गया कि लोग इस शातिर शख्स ...

नेट न्यूट्रीलिटी’ का अनसुलझा सवाल ...

नेट न्यूट्रीलिटी’ का अनसुलझा सवाल ...
-मनोज कुमार। संचार माध्यमों के विस्तार के साथ ही इंटरनेट ने एक ऐसी दुनिया क्रियेट की जिसके चलते विश्व-ग्राम की अवधारणा की स्थापना हुई। बहुसंख्या में आज भी लोग इंटरनेट फ्रेंडली भले ही न हुए हों लेकिन ज्यादतर काम इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। बाजार ने जब देखा कि इंटरनेट के बिना अब समाज का काम नहीं चलना है तो उसने
-मनोज कुमार। संचार माध्यमों के विस्तार के साथ ही इंटरनेट ने एक ऐसी दुनिया क्रियेट की जिसके चलते विश्व-ग्राम की अवधारणा की स्थापना हुई। बहुसंख्या में आज भी लोग इंटरनेट फ्रेंडली भले ही न हुए हों लेकिन ज्यादतर काम इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। बाजार ने जब देखा कि इंटरनेट के बिना अब समाज का काम नहीं चलना है तो उसने अपने पंजे फैलाना आरंभ कर दिया ...
Latest News Manoj Mohanka may acquire Deccan Chronicle मजीठिया मामले से जुड़ा घूसखोर सहायक कामगार आयुक्त गिरफ्तार तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है दैनिक जागरण की खबर किसमें कितना है दम को लेकर माफीनामा विशेष योगदान के लिए विभूतियों को सम्मानित पत्रिका के पत्रकार प्रभात सिंह गिरफ्तार आलोक पराड़कर की पुस्तक का लोकार्पण 27 को दूरदर्शन पटना के समाचार संपादक संजय को मिला गौरैया संरक्षण प्रतियोगिता में दूसरा सम्मान सामुदायिक रेडियो पर जीवंत संवाद करती किताब ‘कम्युनिटी रेडियो’ जागरण को लग सकता है जोर का झटका दबंग हुआ अपंग, कई किए गए बाहर द मिलि गैजेट वेब पोर्टल के पत्रकार पुष्प शर्मा से पूछताछ Respectful tribute to Pandit Surya Narayan Sharma मजीठिया मामला: जीत के करीब हैं हम, देखें ताजा आदेश के मायने सर्वोच्च न्यायालय के रुख से अखबार मालिकानों में हड़कंप महिला पत्रकार को धमकाया वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री सूर्यनारायण शर्मा का निधन प्रधानमंत्री से सवाल पूछा, हिरासत में पत्रकार गीत दीक्षित का टूट गया है दबंग दुनिया से नाता Final Hearing of Majithia Case on 19th July नेशनल हेराल्ड मामला: सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर कांग्रेस की 2010-11 की बैलेंस शीट तलब राजनीतिक दवाब में हो सकता है अनुराग कश्यप का तबादला ये देखिए बीबीसी ने क्या कर डाला जयपुर में फर्जी पत्रकार गिरफ्तार Even Shillong Times, only major newspaper of Meghalaya has skipped Majithia IFWJ Working Committee Restricts Two Terms for any Office Bearer मालिक जेल में हैं लेकिन चैनल पर राष्ट्रभक्ति जारी है 14 मार्च को होगी मजीठिया मामले की सुनवाई वीडियो संपादक की हत्या के मामले में दो गिरफ्तार जागरण का एक और विस्फोटक आंतरिक मेल पढ़ने के लिए हो जाइए तैयार साईं प्रसाद के दफ्तर में छापा, तीन ऑफिस सील शिक्षकों का रुख देख प्रभात खबर ने घुटने टेके मजीठिया वेतनमान: जब उम्मीद खत्म हो जाए तब होता है न्याय रिपोर्टर रिपोर्टिंग के अलावे सारे काम कर रहे महिला रिपोर्टर का 'न्यूड' वीडियो बनाने और चलाने पर करोड़ों का जुर्माना गया में पत्रकार के घर से लूटे 12 लाख के जेवर पत्रकार बरखा दत्त को मिल रही धमकियां पुणे बेबाक भारत के वर्धापनदिन के अवसर पर पांच वरिष्ट पत्रकारों को बेस्ट पत्रकारिता अवार्ड से नव दूर की " कौडी " नहीं है मजीठिया मजीठिया: लेटलतीफी और समय पर जवाब न देने पर जागरण पर लगा 10 हजार रुपये का जुर्माना निर्णायक मोड़ पर मजीठिया आंदोलन, सतर्क रहें आंदोलनकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी पर लगी रोक, प्रबंधन की एक और हार मुम्बई के यशोभूमि समाचार पत्र में संपादक से प्यून और प्रूफ रीडर तक है सगे भाई नेशनल दुनिया के मालिकों को अंतिम मौका, पीएफ राशि जमा नहीं कराई तो गिरफ्तारी वारंट बिहार जागरण का इंटरनल मेल पढ़िए, साथियों को लेकर किस तरह की कटेगरी बनी है पत्रकार पर हमला करनेवालों को शीघ्र करें गिरफ्तार India Today Conclave explores the concept of ‘POWERPLAY’ for its 15th edition पत्रकार पवन कुमार के साथ उस रात्रि क्या हुआ, पढ़े पत्रकार अशोक शर्मा का निधन सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म